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विवाह में फेरे ‘सात’ ही क्यों?

Brijesh Shukla

विवाह और सात फेरे हिंदू विवाह में सात फेरों की खास अहमियत है। ऐसा क्यों है कि विवाह में जब तक सात फेरे नहीं हो जाते, तब तक विवाह संस्कार पूर्ण नहीं माना जाता। न एक फेरा कम, न एक ज्यादा। जानें फेरे सात ही क्यों होते हैं। आखिर हमारे ऋषि-मनीषियों ने इस सात के आंकड़े को शादी का आधार क्यों माना…

विवाह में सात फेरे ही क्यों?

सप्तपदी में पहला पग भोजन व्यवस्था के लिए, दूसरा शक्ति संचय, आहार तथा संयम के लिए, तीसरा धन की प्रबंध व्यवस्था हेतु, चौथा आत्मिक सुख के लिए, पाँचवाँ पशुधन संपदा हेतु, छटा सभी ऋतुओं में उचित रहन-सहन के लिए तथा अंतिम सातवें पग में कन्या अपने पति का अनुगमन करते हुए सदैव साथ चलने का वचन लेती है तथा सहर्ष जीवन पर्यंत पति के प्रत्येक कार्य में सहयोग देने की प्रतिज्ञा करती है।

सप्तपदी प्रथा

आख़िरकार विवाह में ‘सप्तपदी’ अग्नि के सात फेरे तथा वर-वधु द्वारा सात वचन ही क्यों निर्धारित किए गए हैं? इनकी संख्या सात से कम या अधिक भी हो सकती थी। ध्यान देने योग्य बात है कि भारतीय संस्कृति में सात की संख्या मानव जीवन के लिए बहुत विशिष्ट मानी गई है। वर-वधु सातों वचनों को कभी न भूलें और वे उनकी दिनचर्या में शामिल हो जाएँ।

भारतीय संस्कृति में सात के अंक का बहुत महत्व है। सात अंक बहुत शुभ माना गया है। इसे मंगल, लाभ और सुखों में वृद्धि का प्रतीक कहा गया है।

विवाह में कन्या अपने वर से सात वचन भी लेती है। ज्यादातर लोगों ने यह बात सुनी है कि विवाह में सात फेरों के सात वचन होते हैं जिसे वर को जीवनभर निभाना चाहिए, लेकिन उन वचनों का अर्थ क्या होता है, इस बारे में बहुत कम जानकारी है।

इस कड़ी में आप जानेंगे उन सात वचनों के बारे में। इन्हें पढ़कर हमें प्राचीन ऋषियों, दार्शनिकों की दूरदर्शिता पर हर्ष मिश्रित आश्चर्य होता है। कितने महान और दूरदर्शी थे वे लोग जिन्होंने मात्र सात वचनों में ही पूरे जीवन का समावेश कर दिया!

प्रथम वचन

विवाह में कन्या द्वारा वर से लिया गया पहला वचन इस प्रकार है-

तीर्थव्रतोद्यापन यज्ञकर्म मया सहैव प्रियवयं कुर्याः।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति वाक्यं प्रथमं कुमारी।।

इसका मतलब है – कन्या वर से कहती है कि यदि आप कभी तीर्थयात्रा पर जाएं तो मुझे साथ लेकर जाइए। किसी भी व्रत-उपवास या अन्य धार्मिक संस्कारों में मुझे आज की तरह ही अपने वाम भाग में स्थान दीजिए। यदि आप जीवन-यात्रा के लिए मुझे स्वीकार करते हैं तो मैं आपके वाम अंग में आना स्वीकार करती हूं।

दूसरा वचन

इसके बाद बारी आती है दूसरे वचन की। इसमें कहा गया है –

पूज्यौ यथा स्वौ पितरौ ममापि तथेशभक्तो निजकर्म कुर्याः।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं द्वितीयम।।

कन्या अपने वर से दूसरा वचन मांगते हुए कहती है – जिस तरह आप अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं, उसी तरह मेरे माता-पिता का भी सम्मान कीजिए।

आप कुटुंब की मर्यादा के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान करते हुए ईश्वर के भक्त बने रहें तो मैं आपके वाम अंग में आना स्वीकार करती हूं।

तीसरा वचन

तीसरे वचन में कहा गया है –

जीवनं अवस्थात्रये मम पालनां कुर्यात।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं तृतीयं।।

इस बार कन्या अपने वर से कहती है कि आप जीवन की तीनों अवस्थाओं यानी युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था में मेरा पालन करेंगे, तो मैं आपके वाम अंग में आना स्वीकार करती हूं।

चौथा वचन

चौथे वचन में कहा गया है –

कुटुंबसंपालनसर्वकार्य कर्तु प्रतिज्ञां यदि कांतं कुर्याः।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं चतुर्थ।।

कन्या चौथे वचन में अपने वर से कहती है कि अब तक आप (विवाह से पूर्व) घर-परिवार की चिंता आदि से मुक्त थे। चूंकि आप विवाह करने जा रहे हैं तो भविष्य में परिवार की आवश्यकताओं का दायित्व आप पर है। यदि आप इस दायित्व को ग्रहण करते हैं तो मैं आपके वाम अंग में आना स्वीकार करती हूं।

पांचवां वचन

विवाह के पांचवें वचन में कहा गया है –

स्वसद्यकार्ये व्यवहारकर्मण्ये व्यये मामापि मंत्रयेथा।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वचः पंचमत्र कन्या।।

इसमें कन्या वर से कहती है कि विवाह के बाद आप घर के कार्यों में, विवाह व अन्य संस्कारों, वस्तुओं व धन के लेन-देन, किसी भी प्रकार के व्यय आदि में मेरी राय लें तो मैं आपके वाम अंग में आना स्वीकार करती हूं।

छठा वचन

छठे वचन में कहा गया है –

न मेपमानमं सविधे सखीनां द्यूतं न वा दुव्र्यसनं भंजश्चेत।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं च षष्ठम।।

कन्या अपने वर से कहती है कि जब मैं मेरी सखियों अथवा अन्य महिलाओं के बीच बैठी हूं तो आप उनके सामने किसी भी कारण से मेरा अपमान कभी नहीं करेंगे।

यदि आप जुआ और किसी भी प्रकार की अन्य बुरी आदतों (व्यसनों) से दूर रहें तो ही मैं आपके वाम अंग में आना स्वीकार करती हूं। आज के संदर्भ में यह वचन बहुत महत्वपूर्ण और प्रासंगिक है। हर विवाहित व्यक्ति को यह वचन अवश्य ही निभाना चाहिए।

सातवां वचन

विवाह का सातवां वचन भी अन्य छह वचनों के समान ही बहुत महत्वपूर्ण है। इसमें कहा गया है –

परस्त्रियं मातृसमां समीक्ष्य स्नेहं सदा चेन्मयि कांत कुर्याः।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: सप्तममत्र कन्या।।

और इस वचन में कन्या अपने वर से कहती है कि आप पराई स्त्रियों को माता के समान समझेंगे। पति-पत्नी के प्रेम के रिश्ते के बीच किसी और को कभी भी भागीदार नहीं बनाएंगे। यदि आप यह वचन मुझे दें तो ही मैं आपके वाम अंग में आना स्वीकार करती हूं। यह वचन सुखी गृहस्थी की आधारशिला है। इससे दोनों का वर्तमान ही नहीं बल्कि भविष्य भी सुंदर व खुशहाल हो जाता है।

क्यों लिए जाते हैं सात फेरे

जैसा कि पूर्व में उल्लेख किया गया है, सात के अंक को आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत पवित्र माना गया है। इसके पीछे एक और मान्यता भी है। ईश्वर ने रंग सात बनाए हैं और संगीत के सुर भी सात ही हैं।

कहा जाता है कि सातों सुरों के मिलने से एक सुंदर संगीत बनता है जिसकी धुन से जीवन सरस हो जाता है। इसी प्रकार सात रंगों के संगम से ही यह संसार सुंदर बनता है। विवाह के फेरों के पीछे मान्यता है कि इससे विवाहित जोड़ों के जीवन में सुख, आनंद, सुंदरता, सामंजस्य और प्रेम बरकरार रहेगा।

इन सातों वचनों में एक बात खासतौर से गौर करने लायक है। ये सभी वचन कन्या द्वारा वर से मांगे गए हैं। इनके बाद कन्या जीवन-संगिनी बनकर वर के साथ जीवनभर के लिए उसके घर आ जाती है।

ये सातों वचन प्राचीन काल में जितने प्रासंगिक थे, आज उससे कहीं ज्यादा प्रासंगिक हैं। अगर इनका पालन किया जाए तब न तो दहेज के लोभ से किसी बहू को जिंदा जलाने की नौबत आएगी, न परिवार टूटेंगे और न ही दोनों में से किसी एक को कभी विवाह के निर्णय से पछतावा होगा। ये सातों वचन सुखी जीवन के आधार हैं और इनका पालन अवश्य करना चाहिए।

इंद्रधनुष के सात रंग

ऐसा माना जाता है, क्योंकि वर्ष एवं महीनों के काल खंडों को सात दिनों के सप्ताह में विभाजित किया गया है। सूर्य के रथ में सात घोड़े होते हैं जो सूर्य के प्रकाश से मिलनेवाले सात रंगों में प्रकट होते हैं। आकाश में इंद्र धनुष के समय वे सातों रंग स्पष्ट दिखाई देते हैं। दांपत्य जीवन में इंद्रधनुषी रंगों की सतरंगी छटा बिखरती रहे इस कामना से ‘सप्तपदी’ की प्रक्रिया पूरी की जाती है।

सात कदम में मैत्री

‘मैत्री सप्तपदीन मुच्यते’ अर्थात् एक साथ सिर्फ़ सात कदम चलने मात्र से ही दो अनजान व्यक्तियों में भी मैत्री भाव उत्पन्न हो जाता है। अतः जीवनभर का संग निभाने के लिए प्रारंभिक सात पदों की गरिमा एवं प्रधानता को स्वीकार किया गया है। सातवें पग में वर, कन्या से कहता है कि, ”हम दोनों सात पद चलने के पश्चात परस्पर सखा बन गए हैं।”

सात सुरों का संगीत

वर-वधु विवाह में परस्पर मिलकर यह कामना करते हैं कि उनके द्वारा मिलकर उठाए गए सात पगों से प्रारंभ जीवन में आनंददायी संगीत के सभी सुर समाहित हो जाएँ ताकि वे आजीवन प्रसन्न रह सकें। सर्वविदित है कि भारतीय संगीत में सा, रे, गा, मा, पा, धा, नि अर्थात – षड़ज, ऋषभ, गांधोर, मध्यम, पंचम, धैवत तथा निषाद ये सात स्वर होते हैं। इसी प्रकार अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल ये सात तल कहे गए हैं।

सात समंदर सा बंधन

मन, वचन और कर्म के प्रत्येक तल पर पति-पत्नी के रूप में हमारा हर कदम एक साथ उठे इसलिए आज अग्निदेव के समक्ष हम साथ-साथ सात कदम रखते हैं। हमारे जीवन में कदम-कदम पर मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलह, केतु, पौलस्त्य और वैशिष्ठ ये सात ऋषि हम दोनों को अपना आशीर्वाद प्रदान करें तथा सदैव हमारी रक्षा करें। भू, भुवः स्वः, महः, जन, तप और सत्य नाम के सातों लोकों में हमारी कीर्ति हो। हम अपने गृहस्थ धर्म का जीवन पर्यंत पालन करते हुए एक-दूसरे के प्रति सदैव एकनिष्ठ रहें और पति-पत्नी के रूप में जीवन पर्यंत हमारा यह बंधन सात समंदर पार तक अटूट बना रहे तथा हमारा प्यार सात समुद्रों की भांति विशाल और गहरा हो।

हिन्दू संस्कृति मे सात का महत्व

प्रातःकाल मंगल दर्शन के लिए सात पदार्थ शुभ माने गए हैं। गोरोचन, चंदन, स्वर्ण, शंख, मृदंग, दर्पण और मणि इन सातों या इनमें से किसी एक का दर्शन अवश्य करना चाहिए। शौच, दंतधावन, स्नान, ध्यान, भोजन, भजन और शयन सात क्रियाएँ मानव जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। शास्त्रों में माता, पिता, गुरु, ईश्वर, सूर्य, अग्नि और अतिथि इन सातों को अभिवादन करना अनिवार्य बताया गया है ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, लोभ, मोह, घृणा और कुविचार ये सात आंतरिक अशुद्धियाँ बताई गई हैं। मानव जीवन में सात सदाचारों का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। इनका पालन करने से ये सात विशिष्ट लाभ होते हैं। जीवन में सुख, शांति, भय का नाश, विष से रक्षा, ज्ञान, बल और विवेक की वृद्धि होती हैं।

( संग्रहित)

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